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गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

अपनी आध्यात्मिक अवस्था को कैसे जाने

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प्रत्येक साधक की कुछ दिन ध्यान साधना करने के बाद यह जानने की इच्छा होती हैं 
की मेरी कुछ आध्यात्मिक प्रगति हुई या नहीं और आध्यात्मिक प्रगति को नापने का मापदंड है  आपका अपना चित्त,आपका अपना चित्त कितना शुद्ध और पवित्र हुआ है  वही आपकी आध्यात्मिक स्थिति को दर्शाता हैं ।अब आपको भी अपनी आध्यात्मिक प्रगति जानने की इच्छा हैं तो आप भी इन निम्नलिखित चित्त के स्तर से अपनी स्वयम की आध्यात्मिक स्थिति को जान सकते हैं ,बस अपने चित्त का प्रामाणिकता के साथ ही अवलोकन करें यह अत्यंत आवश्यक हैं ।

1 ) दूषित चित्त --: चित्त का सबसे निचला स्तर हैं  दूषित चित्त  इस स्तर पर साधक सभी के दोष ही खोजते रहता हैं  दूसरा  सदैव सबका बुरा कैसे किया जाए सदैव इसी का विचार करते रहता है  दूसरों की प्रगति से सदैव ईर्ष्या करते रहता हैं  नित्य नए-नए उपाय खोजते रहता हैं की किस उपाय से हम दुसरे को नुकसान पहुँचा सकते हैं  सदैव नकारात्मक बातों से  नकारात्मक घटनाओं से  नकारात्मक व्यक्तिओं से यह  चित्त सदैव भरा ही रहता हैं 

2 ) भूतकाल में खोया चित्त --: एक चित्त एसा होता हैं 
 वः सदैव भूतकाल में ही खोया हुआ होता हैं | वह सदैव भूतकाल के व्यक्ति और भूतकाल की घटनाओं में ही लिप्त रहता हैं  जो भूतकाल की घटनाओं में रहने का इतना आधी हो जाता हैं की उसे भूतकाल में रहने में आनंद का अनुभव होता हैं 

3 ) नकारात्मक चित्त --: इस प्रकार का चित्त सदैव बुरी संभावनाओं से ही भरा रहता हैं  सदैव कुछ-न कुछ बुरा ही होगा यह वह चित्त चित्तवाला मनुष्य सोचते रहता हैं  यह अति भूतकाल में रहने के कारण होता हैं क्योंकि अति भूतकाल में रहने से वर्त्तमान काल खराब हो जाता हैं 

 4 ) सामान्य चित्त : यह चित्त एक सामान्य प्रकृत्ति का होता हैं इस चित्त में अच्छे  बुरे  दोनों ही प्रकार के विचार आते हैं  यह जब अच्छी संगत में होता हैं  तो इसे अच्छे विचार आते हैं और जब यह बुरी संगत में रहता हैं तब उसे बुरे विचार आते हैं  यानी इस चित्त के अपने कोई विचार नहीं होते जैसी अन्य चित्त की संगत मिलती हैं  वैसे ही उसे विचार आते हैं  वास्तव में वैचारिक प्रदुषण के कारण नकारात्मक विचारों के प्रभाव में ही यह ‘सामान्य चित्त’ आता हैं 

 5 ) निर्विचार चित्त : साधक जब कुछ  साल  तक ध्यान साधना करता हैं  तब यह निर्विचार चित्त की स्थिति साधक को प्राप्त होती है  यानी उसे अच्छे भी विचार नहीं आते और बुरे भी विचार नहीं आते  उसे कोई भी विचार ही नहीं आते  वर्त्तमान की किसी परिस्थितिवश अगर चित्त कहीं गया तो भी वह क्षणिकभर ही होता हैं  जिस प्रकार से बरसात के दिनों में एक पानी का बबुला एक क्षण ही रहता हैं  बाद में फुट जाता हैं  वैसे ही इनका चित्त कहीं भी गया तो एक क्षण के लिए जाता हैं  बाद में फिर अपने स्थान पर आ जाता हैं  यह आध्यात्मिक स्थिति की प्रथम पादान  हैं होती हैं क्योकि फिर कुछ साल तक अगर इसी स्थिति में रहता हैं तो चित्त का सशक्तिकरण होना प्रारंभ हो जाता हैं और साधक एक सशक्त चित्त का धनि हो जाता हैं 

 6 ) दुर्भावनारहित चित्त : चित्त के सशक्तिकरण के साथ-साथ चित्त में निर्मलता आ जाती हैं  और बाद में चित्त इतना निर्मल और पवित्र हो जाता हैं कि चित्त में किसी के भी प्रति बुरा भाव ही नहीं आता हैं  चाहे सामनेवाला का व्यवहार उसके प्रति कैसा भी हो  यह चित्त की एक अच्छी दशा होती हैं 

 7 ) सद्भावना भरा चित्त : ऐसा चित्त बहुत ही कम लोगों को प्राप्त होता हैं  इनके चित्त में सदैव विश्व के सभी प्राणिमात्र के लिए सदैव सद्भावना ही भरी रहती हैं  ऐसे चित्तवाले मनुष्य  संत प्रकृत्ति के होते हैं  वे सदैव सभी के लिए अच्छा  भला ही सोचते हैं  ये सदैव अपनी ही मस्ती में मस्त रहते हैं  इनका चित्त कहीं भी जाता ही नहीं हैं  ये साधना में लीन रहते हैं 

 8 ) शून्य चित्त -: यह चित्त की सर्वोत्तम दशा हैं  इस स्थिति में चित्त को एक शून्यता प्राप्त हो जाती हैं  यह चित्त एक पाइप जैसा होता हैं  जिसमें साक्षात परमात्मा का चैतन्य सदैव बहते ही रहता हैं  परमात्मा की  करूणा की शक्ति सदैव ऐसे शून्य चित्त से बहते ही रहती हैं  यह चित्त कल्याणकारी होता हैं  यह चित्त किसी भी कारण से किसी के भी ऊपर आ जाए तो भी उसका कल्याण हो जाता हैं  इसीलिए ऐसे चित्त को कल्याणकारी चित्त कहते हैं  ऐसे चित्त से कल्याणकारी शक्तियाँ सदैव बहते ही रहती हैं  यह चित्त जो भी संकल्प करता हैं  वह पूर्ण हो जाता हैं  यह सदैव सबके मंगल के ही कामनाएँ करता हैं  मंगलमय प्रकाश ऐसे चित्त से सदैव निरंतर निकलते ही रहता हैं 

अब आप अपना स्वयम का  अवलोकन करें और जानें की आपकी आध्यात्मिक स्थिति कैसी हैं  आत्मा की पवित्रता का और चित्त हा बड़ा ही निकट का संबंध होता हैं  अब तो यह समझ लो की चित्तरूपी धन  लेकर हम जन्मे हैं और जीवनभर हमारे आसपास सभी चित्तचोर जो चित्त को दूषित करने वाले ही रहते हैं  उनके बीच रहकर भी हमें अपने चित्तरूपी धन को संभालना हैं  अब कैसे  सभी प्रबुध्द सूझवान और समझदार लोग है
सिध्दयोग का अभ्यास किया नही जा सकता  यह अपने आप स्वचलित-स्वघटित होता है सिद्ध योग के अभ्यास का मतलब है,हमेशा, धैर्य  समभाव- कृतज्ञता और आनंद के राज्य में रहना 

               ॐ नमः शिवाय

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बुधवार, 7 अप्रैल 2021

यह आत्मा चैतन्य है

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मुक्त है। असीम है।सभी में व्याप्त है। आत्मा को किसी भी बंधन में बांधा नहीं जा सकता शरीर तो सीमित है।

 मन बुद्धि सीमित है। यह सारी विविधता शारीरिक और मानसिक है।आत्मा में कोई विविधता नहीं तुम शरीर नहीं हूं व्यापक आत्मा हो इस कारण तुम सदैव से ही मुक्त हो यह मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है।

 इसको प्राप्त नहीं करना या तो स्वयं ही उपलब्ध है।केवल इसकी पहचान करने की आवश्यकता है। कि एवं उपभोक्ता होकर कोई ठीक से मात्र सुन ले तो घटना घट जाएगी उसी पल जन्मों-जन्मों की विस्मृति टूट जाएगी स्मरण लौट आएगा खोज करने वाला भटक जाता है।

 खोज करने से परमात्मा नहीं मिलता खोजों को छोड़ कर संसार के प्रति उदासीनता त्याग वान होकर विश्राम में स्थित हो जाना ही पा लेने का मार्ग है।

 आत्मा व्यापक है।सब में एक ही है।किंतु शरीर की विविधता के कारण अज्ञानी व्यक्ति को आत्मा की दिव्या दत्ता का संदेह हो जाता है यह मेरी आत्मा है।उसकी आत्मा अलग-अलग आत्मा आत्मा अनंत है। आदि यह अज्ञान  है।

ओ३म

पंडित महाबीर प्रसाद

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मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

आध्यात्म ज्ञान

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अध्यात्म ज्ञान धारण करने का तत्व है हम जितना अध्यात्म को धारण करते जाएंगे उतना ज्यादा ईश्वर का और सत्य का अनुभव करते जाएंगे बिना धारण किए हुए यह ज्ञान हमारे किसी काम का नहीं है ?
जैसे ठंड का महीना चल रहा है हमें ठंडी भी खूब लग रही है और हम कंबल का खूब बखान करें कंबल इतना होता है मोटा होता है बहुत गर्म करता है कंबल उड़ने वाले को ठंड नहीं लगता है कंबल में हाथ पैर साहब सीमेट लेते हैं कंबल का कितना भी बखान कर ले जब तक हम उस कंबल को अपने शरीर पर धारण नहीं करेंगे तब तक उस कंबल का कितना भी बखान कर ले वह हमारे किसी काम का होता नहीं है ठीक उसी प्रकार से ज्ञान जब तक धारण न किया जाए हमारे किसी काम का नहीं है,
कंबल को शरीर पर धारण किया जाता है , और ज्ञान को हमारे अंतःकरण पर ज्ञान रूपी प्रकाश धीरे-धीरे अंतः करण को नया प्रकाश देकर अंधकार रूपी अज्ञान को नष्ट कर देता है जिससे जीवन की सत्यता और सार्थकता का अनुभव होता है ?
इसलिए महापुरुषों ने कहा है बाहर से कितना भी ज्ञान ले लो वह ज्ञान जब तक हमारे अंतःकरण में प्रकट नहीं होगा तब तक बाहरी ज्ञान से काम चलेगा नहीं मनुष्य जीवन के कल्याण के लिए ज्ञान को अंतःकरण में धारण करना ही पड़ेगा

शुद्ध आध्यात्म ज्ञान

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वास्तविक स्वरूप

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मनुष्य का वास्तविक स्वरूप उसकी आत्मा है। किन्तु मन को ही अपना स्वरूप मान लेता है। अपने को चैतन्य स्वरूप मानने पर साधक चिदानंद स्वरूप में लीन हो जाता है।

जिस प्रकार आकाश भी शून्य स्वभाव है। तो भी उसकी सत्ता को स्वीकार किया गया है। इसी प्रकार वह परमात्मा भी शून्य स्वभाव वाला होते हुवे भी उसकी सत्ता है। उसे कई प्रयोगों व प्रमाणों से सिद्ध किया जा सकता है। वह किसी भी प्रकार की आकृति से रहित होते हुवे भी मिथ्या नही है।

वही ईस्वर विस्वाब्यापी चैतन्य है जो अपने भीतर आत्मा रूप में अवस्थित है। शरीर मे जो पीड़ा होती है। वह उस आत्मा चैतन्य के कारण ही होती है। उसकी उपस्थिति में पीड़ा नही हो सकती अतः पीड़ा का अनुभव करने वाली चेतना ही है।

साधक जब अन्तर्मुखी हो जाता है। तो उसे आत्मस्वरूप का ज्ञान हो जाता है। ये सारी इच्छाएं वासनाये आदि केवल मन की उपज है। मन के शांत होने पर योगी आत्मस्वरूप हो जाता है।

यह आत्मा ही ब्रह्म है। अयमात्मा ब्रह्म ऐसी भावना दृढ़ हो जाने पर योगी को परमार्थ तत्व का ज्ञान हो जाता है।

ओउम

पंडित महाबीर प्रसाद

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रविवार, 4 अप्रैल 2021

कर्म और प्रतिकर्म🌹

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हम किसे कर्म समझते हैं? हम प्रतिकर्म को कर्म समझे हुए हैं, रिएक्शन को एक्शन समझे हुए हैं। किसी ने गाली दी आपको, और आपने भी उत्तर में गाली दी। आप जो गाली दे रहे हैं, वह कर्म न हुआ; वह प्रतिकर्म हुआ, रिएक्शन हुआ। किसी ने प्रशंसा की, और आप मुस्कुराए, आनंदित हुए; वह आनंदित होना कर्म न हुआ; प्रतिकर्म हुआ, रिएक्शन हुआ।

आपने कभी कोई कर्म किया है! या प्रतिकर्म ही किए हैं?

चौबीस घंटे, जन्म से लेकर मृत्यु तक, हम प्रतिकर्म ही करते हैं; हम रिएक्ट ही करते हैं। हमारा सब करना हमारे भीतर से सहज-जात नहीं होता, स्पांटेनियस नहीं होता। हमारा सब करना हमसे बाहर से उत्पादित होता है, बाहर से पैदा किया गया होता है।

किसी ने धक्का दिया, तो क्रोध आ जाता है। किसी ने फूलमालाएं पहनाईं, तो अहंकार खड़ा हो जाता है। किसी ने गाली दी, तो गाली निकल आती है। किसी ने प्रेम के शब्द कहे, तो गदगद हो प्रेम बहने लगता है। लेकिन ये सब प्रतिकर्म हैं।

ये प्रतिकर्म वैसे ही हैं, जैसे बटन दबाई और बिजली का बल्ब जल गया; बटन बुझाई और बिजली का बल्ब बुझ गया। बिजली का बल्ब भी सोचता होगा कि मैं कर्म करता हूं जलने का, बुझने का। लेकिन बिजली का बल्ब जलने-बुझने का कर्म नहीं करता है। कर्म उससे कराए जाते हैं। बटन दबती है, तो उसे जलना पड़ता है। बटन बुझती है, तो उसे बुझना पड़ता है। यह उसकी स्वेच्छा नहीं है।

इसको ऐसा लें, किसी ने आपको गाली दी। और अगर आप गाली का उत्तर देते हैं, तो थोड़ा सोचें, यह गाली का उत्तर आपने दिया या देना पड़ा? अगर दिया, तो कर्म हो सकता है; देना पड़ा, तो प्रतिकर्म होगा।

आप कहेंगे, दिया, चाहते तो न देते। तो फिर चाहकर कोशिश करके देखें, तब आपको पता चलेगा। हो सकता है, ओंठों को रोक लें, तो भीतर गाली दी जाएगी। तब आपको पता चलेगा, गाली मजबूरी है; बटन दबा दी है किसी ने। और अगर कोई गाली दे, और आपके भीतर गाली न उठे, तो कर्म हुआ। तो आप कह सकते हैं, मैंने गाली न देने का कर्म किया।

कर्म का अर्थ है, सहज। प्रतिकर्म का अर्थ है, प्रेरित, इंस्पायर्ड। कारण है जहां बाहर, और कर्म आता है भीतर से, वहां कर्म नहीं है।

हम चौबीस घंटे प्रतिकर्म में ही जीते हैं। बुद्ध, या महावीर, या कृष्ण, या क्राइस्ट जैसे लोग कर्म में जीते हैं। उनके जीवन में प्रतिकर्म खोजे से भी नहीं मिलेगा।

प्रतिकर्म गुलामी है, स्लेवरी है; दूसरा आपसे करवा लेता है। जब दूसरा आपसे कुछ करवा लेता है, तो आप गुलाम हैं, मालिक नहीं। कर्म तो वे ही कर सकते हैं, जो गुलाम नहीं हैं।

☘️💞☘️ओशो ☘️💞☘️
गीता-दर्शन – भाग दो
वर्ण-व्यवस्था का मनोविज्ञान
(अध्याय ४) प्रवचन—छठवां

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शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

स्थिर अवस्था चित्त की

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दो विचारो के मध्य जो अवकाश है। वह अवकाश ही उपयोगी है। वही स्थिर अवस्था है। जिस पर ध्यान केंद्रित करने से चेतनतत्व की अनुभूति हो जाती है।

जब तक पानी मे हलचल होती है। तबतक चन्द्रमा का बिम्ब नही दिखाई देता इसी प्रकार मन की चंचलता से ही आत्मा का बिम्ब नही दिखाई देता है।

चित्त जब शून्य अवस्था मे पहुच जाता है। तभी यह ज्ञात होता है। कि क्रिया का कारण भी वही है तथा जो ज्ञान व ज्ञेय है। उसका ज्ञाता भी वही है। ऐसा ज्ञान हो जाना ही परम् उपलब्धि है।

चित्त की व्रती ही ऐसी है। कि वह अपनी इच्छित वस्तु की ओर ही आकृष्ट होती है। उस समय वह दूसरी वस्तु की ओर उसका ध्यान ही नही जाता जब उसे कोई इच्छित वस्तु नही मिलती तभी वह ब्यर्थ और अनुपयोगी को ही उपयोगी समझकर उसकी ओर आकर्षित होता है।

अपने ईस्ट के ध्यान में लगने पर वह सांसारिक पदार्थो की और आकर्षित होता ही नही जब चित्त अपने ईस्ट में इस प्रकार स्थिर हो जाये जैसे पवन रहित स्थान में दीपक की लो स्थिर रहती है। तो इसी अवस्था मे योगी परमानंद की अवस्था प्राप्त होती है।इसी को ब्रह्मस्वरूप होना कहते है।

मन के कारण ही संसार की सभी वस्तुओ में भेद की प्रतीति होती हैं। मन अभेद को नही जान सकता आत्मा के तल पर अभेद का ज्ञान होता है।

मनुस्य बाहरी विषयो में आनंद की खोज करता है। किंतु वह वास्तविक आनंद नही है वास्तविक आनंद तो स्वयं के भीतर ही है। जो स्वयं की आत्मा है।

मनुस्य को आनंद की अनुभूति होती है। वह उस चेतन आत्मा के कारण ही होती है। क्योंकि आत्मा स्वयं आनंद स्वरूप है।

शरीरो में भेद होने से आत्म चेतना में भेद नही हो जाता वह सबमे समान रूप से ब्याप्त है। ऐसा ज्ञान हो जाना ही परम् सिद्धि है।

ओउम

पंडित महाबीर प्रसाद

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कुंडलिनी जागरण के सातों चक्र द्वारा स्वयं को खोजना

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कुंडलिनी जागरण के सात ऊर्जा चक्र...... सम्पूर्ण जान कारी..विषय बहुत लम्बा है रुचि हो तो पढ़ लेना...शेयर कर लेना..आध्यात्मिक राह वालों के लिए वरदान है..
मूलाधार या मूल चक्र ( आधार चक्र )
कुंडलिनी जागरण के सात चक्र में से ये चक्र पहला चक्र है । यह जननेन्द्रिय और मलद्वार के बीच स्थित होता है । स्त्रियों में यह गर्भाशय-ग्रीवा के पीछे स्थित होता है । जहां योनि गर्भाशय से मिलती है । इस स्थान पर एक ब्रह्म ग्रंथि स्थित होती है । जो ब्रह्मा की द्योतक होती है । इसका रंग लाल होता है । द्वितीयक रंग काला होता है । लाल रंग जीवन और भौतिक ऊर्जा का द्योतक है । मूलाधार चक्र चार पंखुड़ियों वाले कमल के फूल के समान दिखाई देता है । यह चतुर्भुज के आकार का होता है । जिसके अन्दर एक त्रिकोण ( योनि का प्रतिरूप ) होता है । त्रिकोण में एक शिवलिंग अवस्थित रहता है जिस पर सर्प के आकार की कुण्डलिनी लिपटी होती है । मूलाधार चक्र में चार नाड़ियां मिलती हैं । इसमें चार ध्वनियां – वं, शं, षं, सं होती हैं और यह ध्वनि मस्तिष्क और हृदय के भागों को कंपित करती हैं । शरीर का स्वास्थ्य इन्हीं ध्वनियों पर निर्भर करता है । यह एडरीनल ग्रंथि को नियंत्रित करता है ।
मूलाधार चक्र पृथ्वी, मातृभूमि, संस्कृति, जीवन से सम्बंधित है । यह ऊर्जा और जीवन का केन्द्र है । मूलाधार चक्र रस, रूप, गंध, स्पर्श, भावों व शब्दों का मेल है । यह अपान वायु का स्थान है तथा मल, मूत्र, वीर्य, प्रसव आदि इसी के अधिकार में हैं । इसको योग में विश्व निर्माण का मूल माना गया है । यही चक्र हमारी दिव्य शक्ति का विकास, मानसिक विकास, और चैतन्यता का मूल स्थान भी है । मूलाधार को स्वस्थ रखने के लिए सांसारिक व आध्यात्मिक शक्ति के बीच तालमेल बनाए रखना चाहिये । शारीरिक रूप से मूलाधार काम-वासना को, मानसिक रूप से स्थायित्व को, भावनात्मक रूप से इंद्रिय सुख को और आध्यात्मिक रूप से सुरक्षा की भावना को नियंत्रित करता है । यह प्रवृत्ति, रक्षा, अस्तित्व और मानव की मौलिक क्षमता से संबंधित है । यह चक्र भय, क्रोध, संताप, लालसा और अपराध-बोध से भी सम्बंधित है । यह स्वर्ग और नर्क दोनों का द्वार है ।
मूलाधार चक्र कुण्डलिनी शक्ति, मानव जीवन की परम चैतन्य शक्ति मानी गई है । ब्रह्माण्ड के निर्माण में आवश्यक सभी तत्व मनुष्य के अन्दर कुण्डलिनी शक्ति के रूप में मौजूद होते हैं । योग क्रिया द्वारा इस शक्ति को जागृत कर अपने अन्दर अदभुत शारीरिक और आध्यात्मिक शक्ति का अनुभव किया जा सकता है । इस चक्र के देवता गणेश और बीज मंत्र ' लं ' है ।
इसका संतुलन बिगड़ने पर रक्त-अल्पता, थकावट, पीठ के निचले हिस्से में दर्द, शियेटिका, अवसाद, सर्दी, हाथ-पैर ठंडे रहना आदि रोग होते हैं)
स्वाधिष्ठान का मतलब स्व ( स्वयं ) + अधिष्ठान ( स्थापित होना ) है । तात्पर्य यह है कि मनुष्य के सभी संस्कार इसी चक्र में स्थित रहते हैं । मस्तिष्क में इनका प्रतिरूप अवचेतन मन है । स्वाधिष्ठान चक्र त्रिकास्थि के निचले हिस्से में मूलाधार से दो अंगुल ऊपर अवस्थित रहती है । इसमें 6 पंखुड़ियों वाला कमल होता है । इस चक्र में 6 नाड़ियां आपस में मिल कर 6 पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की रचना करती हैं । जो दल का द्योतक है । फूल के भीतर अलग-अलग आकार के दो वृत्तों से बना सफेद अर्द्ध चन्द्र स्थित होता है । इसका आकार गोल और रंग नारंगी होता है । अर्द्ध चन्द्र इसका यंत्र है । इस चक्र में ध्वनियां बं, भं, मं, यं, रं, लं आती रहती हैं ।
स्वाधिष्ठान चक्र अवचेतना और भावना से सम्बंधित है । यह मूलाधार चक्र से सम्पर्क रखता है । स्वाधिष्ठान चक्र में संस्कार सुषुप्त रहते हैं और मूलाधार में वे अभिव्यक्त होते हैं । विज्ञान के अनुसार मस्तिष्क हमारे सारे अनुभव और संवेदनओं का विश्लेषण किये बिना अवचेतन प्रकोष्ठों में संचित करता रहता है । कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया में यह चक्र एक बड़ी बाधा बनता है क्योंकि अवचेतन मन में पड़ी ये संवेदनाएं और कर्म कुण्डलिनी को जागृत नहीं होने देता और वह बार-बार मूलाधार में जाकर सुषुप्त हो जाती है । 
इस चक्र का संबन्ध स्वाद, जन्म, परिवार और भावना से है और यह जल तत्व प्रधान है । इसलिए यह रक्त, मूत्र, वीर्य, योनि स्राव, और लसिका से सरोकार रखता है । यह चक्र जिव्हा, जननेन्द्रियों, अंडकोष, वृषण, वृक्क और मूत्राशय का नियंत्रण करता है । इस चक्र से ही प्रजनन क्रिया सम्पन्न होती है तथा इसका संबन्ध सीधे चन्द्रमा से है । इसी चक्र के कारण मन की भावनाएं प्रभावित होती हैं । स्त्रियों में मासिकधर्म चन्द्रमा से सम्बंधित है और इनका नियंत्रण स्वाधिष्ठान चक्र से होता है । इसी के द्वारा मनुष्य के आंतरिक और बाहरी संसार में समानता स्थापित करने का कौशिश करता है तथा व्यक्तित्व का विकास होता है । इस चक्र का ध्यान करने से मन शान्त, निर्मल व शुद्ध होने लगता है । आन्तरिक शत्रु जैसे वासना, क्रोध, लालच आदि का नाश हो जाता है तथा धारणा और ध्यान की शक्ति प्राप्त होती है । इसके देवता श्री ब्रह्मा और सरस्वती हैं । इसका बीज मंत्र 'वं ' है ।
इसका संतुलन बिगड़ने पर मदिरा और नशीले पदार्थों का व्यसन, अवसाद, पीठ के निचले हिस्से में दर्द, अस्थमा या ऐलर्जी, फंगस का संक्रमण, मूत्र विकार, कामुकता विकार, नपुंसकता और कामशीतलता आदि रोग होते हैं ।
  मणि पूरक चक्र...मणि = गहना
पुर = स्थान, शहर
मणिपुर चक्र नाभि के पीछे स्थित है। इसका मंत्र है रम। जब हमारी चेतना मणिपुर चक्र में पहुंच जाती है तब हम स्वाधिष्ठान के निषेधात्मक पक्षों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। मणिपुर चक्र में अनेक बहुमूल्य मणियां हैं जैसे स्पष्टता, आत्मविश्वास, आनन्द, आत्म भरोसा, ज्ञान, बुद्धि और सही निर्णय लेने की योग्यता जैसे गुण।

मणिपुर चक्र का रंग पीला है। मणिपुर का प्रतिनिधित्व करने वाला पशु मेढ़ा (मेष)है। इसका अनुरूप तत्त्व अग्नि है, इसलिए यह 'अग्नि' या 'सूर्य केन्द्र' के नाम से भी जाना जाता है। शरीर में अग्नि तत्त्व सौर मंडल में गर्मी के समान ही प्रकट होता है। मणिपुर चक्र स्फूर्ति का केन्द्र है। यह हमारे स्वास्थ्य को सुदृढ़ और पुष्ट करने के लिए हमारी ऊर्जा नियंत्रित करता है। इस चक्र का प्रभाव एक चुंबक की भांति होता है, जो ब्रह्माण्ड से प्राण को अपनी ओर आकर्षित करता है।

पाचक अग्नि के स्थान के रूप में, यह चक्र अग्न्याशय और पाचक अवयवों की प्रक्रिया को विनियमित करता है। इस केन्द्र में अवरोध कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं, जैसे पाचन में खराबियां, परिसंचारी रोग, मधुमेह और रक्तचाप में उतार-चढ़ाव। तथापि, एक दृढ़ और सक्रिय मणिपुर चक्र अच्छे स्वास्थ्य में बहुत सहायक होता है और बहुत सी बीमारियों को रोकने में हमारी मदद करता है। जब इस चक्र की ऊर्जा निर्बाध प्रवाहित होती है तो प्रभाव एक शक्तिपुंज के समान, निरन्तर स्फूर्ति प्रदान करने वाला होता है - संतुलन और शक्ति बनाए रखता है।

मणिपुर चक्र के प्रतीक चित्र में दस पंखुडिय़ों वाला एक कमल है। यह दस प्राणों, प्रमुख शक्तियों का प्रतीक है जो मानव शरीर की सभी प्रक्रियाओं का नियंत्रण और पोषण करती है। मणिपुर का एक अतिरिक्त प्रतीक त्रिभुज है, जिसका शीर्ष बिन्दु नीचे की ओर है। यह ऊर्जा के फैलाव, उद्गम और विकास का द्योतक है। मणिपुर चक्र के सक्रिय होने से मनुष्य नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्त होता है और उसकी स्फूर्ति में शुद्धता और शक्ति आती है।

इस चक्र के देवता विष्णु और लक्ष्मी हैं। भगवान विष्णु उदीयमान मानव चेतना के प्रतीक हैं, जिनमें पशु चारित्रता बिल्कुल नहीं है। देवी लक्ष्मी प्रतीक है-भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि की, जो भगवान की कृपा और आशीर्वाद से फलती-फूलती है।
।अनाहत चक्र ( हृदय चक्र )
यह अनाहत नाद का स्थल है । अनाहत का अभिप्राय है । जिसे घायल नहीं किया जा सके । अनाहत नाद वह सूक्ष्म आकाशीय स्वर है जिसे एक अनुभवी साधक तभी सुन पाता है, जब वह ध्यान में विशिष्ट ऊंचाई पर पहुंचता है । अनाहत चक्र उरोस्थि के पीछे हृदय के पास स्थित होता है । इस चक्र में 12 पंखुड़ियां वाला कमल होता हैं । इस स्थान पर 12 नाड़ियां मिल कर 12 पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की आकृति बनाती हैं । इसका चिन्ह दो त्रिकोण हैं । एक नीचे इंगित करता है तो दूसरा ऊपर इंगित करता है । यह मध्य चक्र है । अर्थात तीन चक्र इसके ऊपर और तीन चक्र इसके नीचे होते हैं । इसका रंग हरा होता है, द्वितीयक रंग गुलाबी है । इसका व्यास छः सेंटीमीटर का होता है । इस चक्र से ध्वनियां कं, खं, गं, घं, डं, चं, छं, जं, झं, ञं, टं, ठं निकलती हैं । यह स्रावी ग्रंथि से सम्बंधित है और हृदय, फेफड़े, रक्त, वेगस नाड़ी और परिवहन तंत्र को नियंत्रण करता है । यदि यह निर्मल और नियमित लय में है तो व्यक्ति का हृदय स्वस्थ रहता है । शरीर की रक्षाप्रणाली भी इसी के अधीन रहती है । यह चक्र प्राणवायु का स्थान है और यहीं से वायु नासिका द्वारा अन्दर व बाहर होती रहती है । प्राणवायु शरीर की कई मुख्य क्रियाओं का संपादन करती है । जैसे वायु को सभी अंगों तक पहुंचाना, अन्न-जल को पचाना, उसके रस बना कर सभी अंगों में प्रवाहित करना, वीर्य बनाना, पसीने और मूत्र के द्वारा उत्सर्जी तत्वों को बाहर निकालना आदि । इस चक्र में वायु प्रधान है । अनाहत चक्र पर ध्यान करने से मनुष्य, समाज और स्वयं के वातावरण में सुसंगति एवं संतुलन स्थापित करता है । इस पर ध्यान करने से मनुष्य को सभी शास्त्रों का ज्ञान होता है तथा वाकपटु, संसार के जन्म-मरण के विषय में ज्ञान होता है । ऐसे मनुष्य ज्ञानियों में श्रेष्ठ, काव्यमृत रस के आस्वादन में निपुण योगी तथा अनेक गुणों से युक्त होते हैं ।
यह चक्र दिव्य प्रेम का केन्द्र है और आध्यात्मिकता का द्वार है । समर्पण की भावनाएं यहीं जन्म लेती हैं । भावनात्मक आसक्ति व लगाव से सम्बंधित विष्णु ग्रंथि यहीं अवस्थित होती है । जब यह ग्रंथि खुल जाती है तो व्यक्ति स्वार्थ तथा भावनात्मक अस्थिरता से मुक्त हो जाता है तथा हृदय निर्मल, निष्काम, निःस्वार्थ और ईश्वरीय दिव्य प्रेम रस में डूब जाता है ।
इस चक्र के प्रधान वाले लोग समाजसेवी तथा दूसरों का निर्वाह करने वाले होते हैं । इनमें स्पर्श या अपनी ऊर्जा द्वारा दूसरों के कष्ट दूर करने की क्षमता विकसित हो जाती है । इस चक्र के जागृत होने से लोगों में आध्यात्मिक और टेलीपैथी जैसे गुणों का विकास होता है । इस चक्र की देवी श्री जगदम्बा माँ हैं और बीज मंत्र ' यं ' है ।
इसका संतुलन बिगड़ने पर हृदय और श्वास रोग, स्तन कैंसर, छाती में दर्द, उच्च रक्तचाप, रक्षाप्रणाली विकार आदि रोग होते हैं ।विशुद्ध चक्र ( कंठ चक्र )
यह कंठ में स्थित होता है । इसमें 16 पंखुड़ियों वाला कमल होता है । यहां 16 नाड़ियां मिल कर कमल के फूल की आकृति बनाती हैं । इसका रंग आसमानी होता है और चिन्ह अर्द्धचंद्र है । इसका व्यास छः सेंटीमीटर होता है । लेकिन अपनी स्वर-यंत्र का प्रयोग करने वाले लोगों जैसे गायक व अध्यापक आदि में यह बड़ा हो जाता है । इस चक्र में अ से अः तक 16 ध्वनियां निकलती हैं । यह थायरॉयड अंतःस्रावी ग्रंथि से सम्बंधित है । यह थायरॉयड, स्वर-यंत्र, फेफडे, श्वास-नलिका पथ और आहार तंत्र को नियंत्रित करता है ।
विशुद्ध चक्र संचार, संवाद और संप्रेषण का केन्द्र है । यह व्यक्ति को अपने अनुभवों के बारे में बोलने की तीव्र इच्छा शक्ति प्रदान करता है । यह चक्र श्रवण का भी केन्द्र है और मनुष्य के सुनने की शक्ति इतनी विकसित कर देता है कि वह कानों से ही नहीं मन से भी सुनने लगता है । यह मनोवैज्ञानिक दृष्टि से रचनात्मकता, आत्मानुशासन, दायित्व और नेतृत्व का विकास करता है । इस चक्र का ध्यान करने से मनुष्य के रोग, दोष, भय, चिंता, शोक आदि दूर होते हैं और वह लम्बी आयु को प्राप्त करता है । यह चक्र शरीर निर्माण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है । क्योंकि यह चक्र आकाश तत्व प्रधान है और शरीर जिन 5 तत्वों से मिलकर बनता है । उसमें एक तत्व आकाश भी होता है । आकाश तत्व शून्य है तथा इसमें अणु का कोई समावेश नहीं है ।
मानव जीवन में प्राणशक्ति को बढ़ाने के लिए आकाश तत्व का अधिक महत्व है । यह तत्व मस्तिष्क के लिए आवश्यक है और इसका नाम विशुद्ध रखने का कारण यह है कि इस तत्व पर मन को एकाग्र करने से मन आकाश तत्व के समान शून्य और शुद्ध हो जाता है । इस चक्र में बाहरी और आंतरिक विषों को निष्क्रिय करने की क्षमता होती है । यह चक्र पिछले कटु और नकारात्मक अनुभव को निकाल कर जीवन को परमानन्द से भर देता है । विशुद्ध चक्र जागृत होने पर यह मनुष्य में जीवन शक्ति, रचनात्मकता और सच्चा ज्ञान भर देता है । इस चक्र के देवता श्री कृष्ण राधा हैं और बीज मंत्र ' हं ' है । 
इसका संतुलन बिगड़ने पर थायरॉयड विकार, जुकाम और ज्वर, संक्रमण, मुंह, जबड़ा, जीव्हा, कंधा और गर्दन सम्बंधी रोग, उग्रता, हार्मोन विकार, मनोदशा विकार, रजोनिवृत्ति जनित रोग आदि रोग होते हैं ।
अजना या आज्ञा चक्र ( ललाट या तृतीय नेत्र )
अजना चक्र दोनों भौंहों के बीच स्थित होता है । इसमें 2 बड़ी पंखुड़िया वाले कमल का अनुभव होता है । इसकी दो पंखुड़ियां आत्मा-परमात्मा,  तर्क-वितर्क, पिनियल-पिट्यूट्री, इड़ा-पिंगला और नर-नारी को इंगित करती है । सारी द्विविधता यहीं मिलती है । इसमे एक त्रिकोण है । जो योनि का द्योतक है । इस त्रिकोण में एक श्वेत लिंग है । इसका रंग गहरा नीला होता है ।
अजन का अभिप्राय आज्ञा या निगरानी करना है । इसे गुरू चक्र भी कहते हैं । यह शीर्ष ग्रंथि (Pineal) ग्रंथि से सम्बंधित है, जो मेलाटोनिन हार्मोन का स्राव करती है । यह हार्मोन सोने या जागने की क्रिया को नियंत्रित करता है । यह मस्तिष्क के निचले भाग, बाई आंख, कान, नाक, और नाड़ी तंत्र को नियंत्रित करता है । यहां दो ध्वनियां निकलती रहती हैं । इस स्थान पर पिनियल और पिट्यूट्री ग्रंथियां मिलती हैं । इसके जागरण का केन्द्र भौंहों के बीच का बिन्दु है जिसे ब्रह्माध्य कहते हैं । ध्यान, एकाग्रता और आत्मदर्शन के लिए यह बिन्दु बहुत विश्ष्ट है । इस पर ध्यान करने से सम्प्रभात समाधि की योग्यता आती है । मूलाधार से इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना अलग-अलग प्रवाहित होती हुई इसी चक्र पर मिलती हैं और चैतन्यता की एक धारा के रूप में सहस्रार को जाती हैं । इसलिए योग में इस चक्र को त्रिवेणी भी कहा गया है । योग ग्रंथ में इसके बारे में कहा गया है ।इड़ा भागीरथी गंगा पिंगला यमुना नदी ।
तर्योमध्यगत नाड़ी सुषुम्नाख्या सरस्वती ।।
इड़ा को गंगा, पिंगला को जमुना और सुषुम्ना नाड़ी को सरस्वती कहा गया है । इन नाड़ियों का जहां मिलन होता है, उसे त्रिवेणी कहते हैं । जब साधक गहरे ध्यान में होता है और उसकी सारी संवेदनाएं शून्य हो जाती हैं । तब अजना से सहस्रार तक जाने के निर्देश इसी चक्र से मिलते हैं । जो मनुष्य अपने मन से इन चक्रों पर ध्यान करता है । उसके सभी पाप नष्ट होते हैं और दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है । इस चक्र का सम्बंध जीवन को नियंत्रित करने से है । 
इसे शिव का तीसरा नेत्र कहते हैं । इसे अन्तर्ज्ञान का नेत्र भी कहते हैं । क्योंकि यह अन्दर देखता है । कुछ लोग इसे दिव्य-चक्षु कहते हैं । क्योंकि योगियों को ईश्वरीय अन्तरदृष्टि और श्रुतिप्रकाश इसी चक्र से मिलता है । यहीं पहुंच कर मनुष्य को मोक्ष का द्वार दिखाई देता है । यहीं चरमानन्द, अतिसंवेदन-बोध, सूक्ष्म दृष्टि, अतीन्द्रिय श्रवण, अन्तरज्ञान, असाधारण शक्तियां प्राप्त होती हैं । इसी छठे चक्र में मनुष्य को दूरबोध और पुनर्जन्म का ज्ञान होता है । आज्ञा चक्र मन और बुद्धि का मिलन स्थान है । यह उर्ध्व शीर्ष बिन्दु ही मन का स्थान है । इसे रुद्र ग्रंथि कहते हैं । सुषुम्ना मार्ग से आती हुई कुण्डलिनी शक्ति का अनुभव योगी को यहीं आज्ञा चक्र में होता है । योगाभ्यास व गुरू की सहायता से साधक कुण्डलिनी शक्ति को सहस्रार चक्र में विलीन करा कर दिव्य ज्ञान व परमात्मा तत्व को प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त करता है । संवेदनाओं और पांच तत्वों के परे छठा चक्र सूर्य और चन्द्रमा से प्रभावित होता है । इसकी धातुएं स्वर्ण और रजत हैं । इसका बीज मंत्र ' शं ' है ।
इसका संतुलन बिगड़ने पर थायरॉयड विकार, जुकाम और ज्वर, संक्रमण, मुंह, जबड़ा, जीव्हा, कंधा और गर्दन सम्बंधी रोग, उग्रता, हार्मोन विकार, मनोदशा विकार, रजोनिवृत्ति जनित रोग आदि रोग होते हैं ।
सहस्रार चक्र ( शीर्ष चक्र )
सहस्रार चक्र मस्तिष्क के ऊपर ब्रह्मरंध में अपस्थित 6 सेंटीमीटर व्यास के एक अध खुले हुए कमल के फूल के समान होता है । ऊपर से देखने पर इसमें कुल 972 पंखुड़ियां दिखाई देता है । इसमें नीचे 960 छोटी-छोटी पंखुड़ियां और उनके ऊपर मध्य में 12 सुनहरी पंखुड़ियां सुशोभित रहती हैं । इसे हजार पंखुड़ियों वाला कमल कहते हैं । इसका चिन्ह खुला हुआ कमल का फूल है जो असीम आनन्द के केन्द्र होता है । इसमें इंद्रधनुष के सारे रंग दिखाई देते हैं लेकिन प्रमुख रंग बैंगनी होता है । इस चक्र में अ से क्ष तक की सभी स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती है । पिट्यूट्री और पिनियल ग्रंथि का आंशिक भाग इससे सम्बंधित है । यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा और दाई आंख को नियंत्रित करता है । यह आत्मज्ञान, आत्मदर्शन, एकीकरण, स्वर्गीय अनुभूति के विकास का मनोवैज्ञानिक केन्द्र है ।
यह आत्मा का उच्चतम स्थान है । इस चक्र को देख कर व्यक्ति के स्वभाव और चरित्र का अनुमान लगाया जा सकता है । इसका विस्तार, रंग, गति, आभा और बनावट देख कर व्यक्ति की चैतन्यता, आध्यात्मिक योग्यता और अन्य चक्रों से समन्वय का अनुमान लगाया जा सकता है । अच्छा योगाभ्यास करने वाले साधक का चक्र ओजस्वी और शक्तिशाली होता है । सच्चे स्वप्न देखने की क्षमता विकसित हो जाती है । यदि इस चक्र में लचीलापन है तो इसका मतलब है कि व्यक्ति आसानी से अपनी आत्मा को शरीर से निकाल कर कहीं अन्यत्र ले जा सकता है । नीचे के बाकी 6 चक्रों से बिलकुल अलग यह एक अति विशिष्ट और उन्नत चक्र है । यह ईश्वरधाम और मोक्ष का द्वार है । जब यह चक्र अच्छी स्थिति में है तो अन्य चक्र स्वतः जागृत हो जाते हैं । जो साधक अपनी कुण्डलिनी जाग्रत कर लेते हैं तो कुण्डलिनी बाल रूप बाला त्रिपुरा सुन्दरी के रूप में ऊपर उठती है । थोड़ा और ऊपर पहुंचने पर वह यौवन को प्राप्त कर राजराजेश्वरी का रूप धरती है और सहस्रार चक्र तक वह संपूर्ण स्त्री ललिताम्बिका का रूप धर लेती है । जो साधक कुण्डलिनी को सहस्रार तक ले कर आते हैं, वे परमानन्द को प्राप्त करते हैं । जिसकी सर्वोच्च अवस्था समाधि है । कुण्डलिनी के इस जागरण को शिव और शक्ति का मिलन कहते हैं । इस मिलन से आत्मा का अस्तित्व खत्म हो जाता है और वह परमात्मा में लीन हो जाती है । इस चक्र पर ध्यान करने से संसार में किये गये बुरे कर्मों का भी नाश होता है । ऐसे साधक अच्छे कर्म करने और बुरे कर्मों का नाश करने में सफल हो जाते हैं । आज्ञा चक्र को सम्प्रज्ञात समाधि में जीवात्मा का स्थान कहा जाता है । क्योंकि यही दिव्य दृष्टि का स्थान है । उसे शिव की तीसरी आंख भी कहते हैं । मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक सभी चक्रों के जागरण की कुंजी सहस्रार चक्र के पास ही है । यही सारे चक्रों का स्वामी है।यह वास्तव में चक्र नहीं है । यह तो साक्षात तथा सम्पूर्ण परमात्मा और आत्मा है । जो व्यक्ति सहस्रार चक्र का जागरण करने में सफल हो जाते हैं, वे जीवन मृत्यु पर नियंत्रण कर लेते हैं । सभी लोगों में अंतिम दो चक्र सोई हुई अवस्था में रहते हैं । अतः इस चक्र का जागरण सभी के वश में नहीं होता है । इसके लिए कठिन साधना व लम्बे समय तक अभ्यास की आवश्यकता होती है । इसके देवता श्री भगवान शंकर हैं और बीज मंत्र ' ॐ ' है ।

स्वयं की खोज एक प्रयास
अष्ट चक्र क्या है अथर्ववेद : यानि हमारी जो शरीर है यह अष्ट चक्र और नव द्वारो की नगरी है. ये जो चक्र है वह कुण्डलिनी के दरवाजे है, फाटक है. कुण्डलिनी के पाश पहुचने के लिए इन चक्रो का ताला लगा हुआ है. जब तक हम विहंगम योग की साधना के द्वारा इन तालो को नही खोलेंगे तब तक हम कुण्डलिनी तक नही पहुंच सकते है. साथ ही हम इनको साधारण नेतो से भी नही देख सकते है जिस प्रकार रोगो के अनेक प्रकार की किटाणुओ को देखने के लिए विशेष प्रकार के यंत्र की जरुरत होती है उसी प्रकार इनको देखने जानने के लिए विशेष प्रकार की साधना की जरूरत होती है और वह है विहंगम योग की विधिवत साधन. आज पुरे विश्व में इन चक्रो के सोधन के लिए अनेक प्रकार की साधनाए बतलायी जाती है जिनको चिर काल तक करने के बाद कुछ मिलता होगा परन्तु एक विहंगम योग ही आज पुरे विश्व में है जिसका साधक बहुत ही अल्प समय में अगर विधिवत साधन सेवा सत्संग करता है तो वह उसे प्राप्त कर लेता है. संत प्रवर कहते है - जब हम प्रचार के क्षेत्र में जाते है तो ऐसे अनेक साधको से मुलाकात होती है तो ये बताते है की मै इस चक्र को जागृत करने का प्रयास कर रहा हु, इस तरह की की मै साधना कर रहा हूँ. कुण्डलिनी के जागृत करने के लिए सुषमन प्रवाह के लिए मै इन चक्रो को उर्धमुखी करना चाहता हूँ इनको खिलाना चाहता हूँ और इस प्रकार मै साधना कर रहा हु. ऐसे बहुतेरे साधक मिलते है. तो ब्रम्हविद्या क्या कहती है विहंगम योग क्या कहता है स्वर्वेद की बाणी है मुद्रा प्राणायाम सब, बंध करे नही संत गुरु प्रसाद खिले कमल, संत मता पर अंत विहंगम योग का साधक चक्रो को जगाने के लिए मुद्रा नही करता, बंध का अभ्यास नही करता, प्राणायाम का अभ्यास नही करता. वह प्राणायाम करता है स्वस्थ के लिए, प्राणो की शक्ति के विकाश के लिए, वह चक्रो को जगाने के लिए थोड़े ही प्राणायाम करता है। ये जो चक्र है वह तो विहंगम योग का साधक को स्वतः ही प्राप्त हो जाता है. ये उर्धमुखी हो जाता है. जिस प्रकार सूर्यमुखी का फूल सूर्य के सामने आने पर खिल जाता है उसी प्रकार ब्रम्ह विद्या के प्रभाव से इसके ताकत से ये सारे चक्र उर्धमुखी हो जाते है वह तो विहंगम योग की विधिवत साधना के द्वारा ही हो जाता है. अलग से कुछ भी करें की आवस्कता नहीं है. अब इन अष्ट चक्रो का संक्षिप्त विवरण १. मूलाधार चक्र - गुदा और मेढु के मध्य में मूलाधार चक्र है. वह चार दल के साथ सुशोभित है. २. स्वाधिष्ठान चक्र - लिंग मूल में स्वाधिष्ठान चक्र है और वह रक्त वर्ण छह दल से सुशोभित है. ३. मणिपूरक चक्र - नाभि स्थान में मणिपूरक चक्र है. वह हेम वर्ण दस दल करके सुशोभित है. ४. अनाहत चक्र - ह्रदय स्थान में अनाहत चक्र है. जो बारह दल युक्त उज्जवल रक्त वर्ण से शोभायमान है और वह प्राण वायु के आधार है ५. विशुद्ध चक्र - विशुद्ध चक्र कंठ स्थान में है और वह सुवर्ण के समान सुशोभित है. ६. ब्रम्हरन्ध्राख्य चक्र - जिह्वा के मूल स्थान में ब्रम्हरन्ध्राख्य चक्र है. ७. आज्ञा चक्र - भ्रूमध्य में आज्ञा चक्र है. इसमें सुन्दर श्वेत वर्ण दो पात्र है. ८. सहस्त्रार चक्र - ब्रम्हरन्ध्र स्थान में सहस्त्रार चक्र अर्थात सहस्त्र दल कमल है ॐ नमः शिवाय

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गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

-पुरुष की अपेक्षा स्त्री क्यों अधिक सुन्दर, सुडौल और आकर्षक होती है ?

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                        भाग--01
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

       इस समस्त विश्वब्रह्माण्ड में एक मूल परमतत्व है जिसे लोगों ने 'परब्रह्म' के नाम से पुकारा है, 'परमेश्वर' के नाम से संबोधित किया है।
       भारतीय तत्ववेत्ताओं के अनुसार सृष्टि के प्राक्काल में वह मूल परमतत्व घनीभूत होकर दो भागों में विभक्त हो गया। जब भारतीय संस्कृति का विकास हुआ तो लोगों ने उन दोनों भागों को 'शिव' और 'शक्ति' की संज्ञा दी। आगे चलकर सृष्टि के विकास-क्रम में शिव और शक्ति 'पुरुषतत्व' और 'स्त्रीतत्व' की संज्ञा में परिवर्तित हो गए। बाद में वही दोनों तत्व 'ब्रह्म-माया',  'पुरुष-प्रकृति' और 'परमेश्वर-परमेश्वरी' में परिकल्पित हुए।
        इन्हीं दोनों तत्वों से ब्रह्माण्ड में दो प्रकार की विद्युत् चुम्बकीय तरंगें उत्पन्न हुईं जिन्हें आज के वैज्ञानिक 'इलेक्ट्रॉन' और 'प्रोटोन' कहते हैं। इन दोनों तरंगों के बीच एक और तरंग है जिसे 'न्यूट्रॉन' की संज्ञा दी गयी है। न्यूट्रॉन विद्युत् विहीन होते हुए भी चुम्बकीय ऊर्जा से युक्त तरंग है। इन्हीं तीनों तरंगों से परमाणु की रचना होती है। 
      पुरुष तत्व धनात्मक है और स्त्री तत्व  है--ऋणात्मक। यही कारण है कि दोनों तत्व बराबर एक दूुसरे की और उसी प्रकार आकर्षित होते रहते हैं जिस प्रकार परमाणु की परिधि पर इलेक्ट्रॉन बराबर चक्कर लगाया करते हैं। जहाँ आकर्षण है, वहां 'काम' है और काम मिथुनात्मक है अर्थात् आनंद के लिए। दोनों तत्वों के बीच जो आकर्षण है और उस आकर्षण से उत्पन्न जो 'काम' है, वह सृष्टि की दिशा में 'आदि आकर्षण' और 'आदि काम' है। कामजन्य आकर्षण मिथुनात्मक है। इसीलिये कहा गया है कि सृष्टि के मूल में 'मैथुन' है। दो विपरीत तत्वों के आपसी आकर्षण से जब 'काम' का जन्म होता है तो उसकी परणति मैथुन में होती है। मैथुन का परिणाम है--'सृष्टि' जो एक नैसर्गिक क्रिया है और इसी को 'विश्ववासना' कहते हैं तथा स्त्री इसी 'विश्ववासना' की प्रतिमूर्ति है।
       सृष्टि के प्राक्काल में जब शिव (पुरुष) तत्व और शक्ति( स्त्री ) तत्व एक दूसरे की ओर आकर्षित होकर एक दूसरे की सत्ता में विलीन हुए तो उसके परिणाम स्वरुप  विश्व ब्रह्माण्ड में एक विराट और सर्वव्यापी चेतना का आविर्भाव हुआ जिसे आगे चलकर 'परमशक्ति' अथवा 'आदिशक्ति' के नाम से पुकारा गया। यह बिलकुल स्पष्ट है कि इस 'आदिशक्ति' का आदिविकास मिथुनात्मक है।
        शिवतत्त्व और शक्तितत्त्व के आकर्षणात्मक, सामंजस्यात्मक और मिथुनात्मक भाव 'लिंग' और उसकी 'पीठिका' (अर्घा) है। वैदिक काल में इन दोनों को दो अरणियों के रूप में चित्रित किया गया था। ऊपर की अरणी अर्थात् शिवलिंग पुरुषतत्व वाचक और नीचे की अरणी को स्त्रीतत्व वाचक कहा जाता है। शिव की अर्धनारीश्वर छवि भी इसी तथ्य की ओर संकेत करती है।
        रौद्रात्मक, विसर्गात्मक और प्रदानात्मक प्रवृत्ति 'पुरुष' है और सहनात्मक, शान्त्यात्मक और आदानात्मक प्रवृत्ति 'स्त्री' है। प्रदान करने वाला पुरुष और ग्रहण करने वाली स्त्री है। यही नियम सर्वत्र व्याप्त है।
      शैव और शाक्त दर्शन के अनुसार शिव प्रकाश है और शक्ति है स्फूर्ति। सृष्टि के आरम्भ में जब शिव ने आकर्षित होकर शक्ति में प्रवेश किया तो उससे 'बिन्दु' की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार जब शक्ति ने आकर्षित होकर शिव में प्रवेश किया तो दोनों की संयुक्त सत्ता से 'नाद' का जन्म हुआ। 'बिन्दु' और 'नाद' की संयुक्ति से 'काम' का आविर्भाव हुआ। 'काम' में पुरुष और स्त्री दोनों तत्वों का तादात्म्य है।
     'बिन्दु' को 'श्वेत् बिन्दु' और ' नाद' को 'रक्त बिन्दु' कहा जाता है। श्वेतबिन्दु और रक्तबिन्दु के संयोग से 'कला' का निर्माण होता है। पुनः इन दोनों बिन्दुओं और पहले वाले मिश्र बिन्दु के साहचर्य से एक विलक्षणव तत्व का आविर्भाव होता है जिसे 'काम-कला' की संज्ञा दी गयी है। काम पुरुषवाचक है और कला स्त्रीवाचक है। कहने की आवश्यकता नहीं, इसी परमतत्व का दूसरा नाम आदिशक्ति, परमाशक्ति, चेतनाशक्ति है जो अखिल विश्वब्रह्माण्ड में व्याप्त है और जो 'कुण्डलिनी' के रूप में हम सभी मनुष्यों के शरीर में भी विद्यमान है।
        हम-आप सभी जानते हैं--वर्ण मातृकाओं का प्रथम अक्षर 'अ' है और अन्तिम अक्षर है 'ह'। आदि अक्षर 'अ' को शिवतत्त्व और अन्तिम अक्षर 'ह' को शक्तितत्त्व का प्रतीक माना गया है। ये दोनों अक्षर शिव और शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। सभी वर्णाक्षरों का लय 'म्' अक्षर में होता है। 'अ' और 'ह' में यदि 'म्' जोड़ दें तो 'अहम्' शब्द बनता है और यही 'अहम्' शब्द 'काम-कला' का दूसरा नाम है। काम-शक्ति 'कुण्डलिनी' अहम् के रूप में आदिशक्ति है और यही है 'आत्मशक्ति' भी।
        हर व्यक्ति अपने को 'मैं' कहता है। वह 'मैं' को अपना आलम्बन समझता है। संसार के सभी पदार्थ बदलते रहते हैं मगर 'मैं' का जो बोध है, वह कभी नहीं बदलता। मैं हूँ या नहीं हूँ--यह संदेह किसी के मन में कभी नहीं उठता।
        सृष्टि की प्रक्रिया में 'शिव' जड़तत्व है और 'शक्ति' है चेतनतत्व। जड़ चेतना का आधार है। मगर जड़ पदार्थ दिखलाई पड़ता है और उसके माध्यम से प्रकट होने वाली चेतना शक्ति दिखलाई नहीं पड़ती। उसे तो हम सिर्फ महसूस कर सकते हैं। कोई भी शक्ति बिना किसी माध्यम के कभी प्रकट नहीं हो सकती और जिस माध्यम से वह शक्ति प्रकट होती है, उसे गतिमान , चलायमान कर देती है--शक्ति का यह सबसे बड़ा गुण है। जड़ आधार है तो चेतना आधेय है। जड़ 'आसन' है और चेतना है--'आसीन'। शंकर पर आरूढ़ काली की छवि का आगे की ओर बढ़ा हुआ पैर इसी रहस्य को प्रकट करता है। शिव के ऊपर आरूढ़ काली शक्ति की गतिमान अवस्था का द्योतक है।
      हमारा शरीर भी तो जड़ है। जब तक उसे आधार बनाकर चेतना उपस्थित रहती है, तब तक शरीर चैतन्य रहता है, क्रियाशील रहता है जिसे हम जीवन कहते हैं। लेकिन चेतना से शरीर का सम्बन्ध टूटते ही जीवन की कड़ी भी हमेशा के लिए टूट जाती है फिर शरीर 'शिव' से 'शव' हो जाता है।
       सृष्टि के निर्माण के विकास- क्रम में कुण्डलिनी का ही योगदान है। प्राणियों के विकास में शिवतत्त्व 'शुक्रबिन्दु' (Y)के रूप में मनुष्य के शरीर में स्थित 'सहस्रार चक्र' में अवस्थित है। इसी प्रकार शक्तितत्त्व 'रजोबिन्दु' (X)के रूप में स्त्री देह के भीतर 'मूलाधार चक्र' में विद्यमान है। मगर पुरुष शरीर की यह विशेषता है कि उसके मूलाधार चक्र में 'कुण्डलिनी शक्ति' के रूप में 'शिव' और 'शक्ति' दोनों तत्व (X औरY) समान मिश्रित रूप में अर्धनारीश्वर के रूप में और मिथुनात्मक स्थिति में अवस्थित है। यही महामाया है, आदिशक्ति है और यही है-- परमा शक्ति।
        चक्रों में अंतिम चक्र 'सहस्रार' है। इसी चक्र के मूल केंद्र में 'शिववतत्वरूप शुक्रबिन्दु' की स्थिति है। इस शुक्र बिन्दु से बराबर एक विशेष् प्रकार की विद्युत् चुम्बकीय ऊर्जा निकलती रहती है जो ब्रह्मांडीय ऊर्जा में मिलकर अढ़ाई(2.5) बिन्दु अमृत की रचना ब्राह्म मुहूर्त में करती है। यही अमृत जीवनीशक्ति है। पहली बून्द मुंह में गिरती है जिससे मुंह में लार बनती है। मृत्यु के 24 घंटे पहले जब मनुष्य के जीवन की सारी सांसे समाप्त होने वाली होती हैं और उसका समय पूरा होने वाला होता है तो यही अमृत बूंद गिरनी बन्द हो जाती है और फिर धीरे-धीरे मनुष्य मृत्यु की अन्तिम स्थिति की ओर बढ़ने लगता है। उसकी वाणी मूक होने लगती है या लड़खड़ाने लगती है, गला अवरुद्ध होने लगता है, शरीर शीतल होने लगता है और नाड़ी तथा ह्रदय की गति अवरुद्ध होने लगती है। इन लक्षणों के आधार पर मनुष्य को स्वयम् अपनी निकटवर्ती मृत्यु का बोध होना शुरू हो जाता है। अन्त में वह मूर्छा में चला जाता है जो कुछ ही समय में मृत्यु की मूर्छा के रूप में बदल जाती है। 
        दूसरी बून्द जो हृदय में पहुँचती है, जो उसे शक्ति प्रदान करती है और जिसके ही कारण हृदय चौबीसों घंटे बराबर काम करता रहता है, वह भी गिरना बन्द हो जाती है और हृदय को शक्ति मिलना बन्द हो जाती है। शेष आधी बून्द नाभि में पहुँचती है, जिससे हमें भूख लगती है और अन्न का रस बनता है। उस आधी बून्द के बन्द होते ही भूख-प्यास ख़त्म हो जाती है और पेट की पाचन क्रिया भी बन्द हो जाती है।
        इसी प्रकार स्त्री के मूलाधार चक्र में शक्तितत्वस्वरूप 'ऋणात्मक राजोबिन्दु' की स्थति है। इससे भी विद्युत् चुम्बकीय ऊर्जा निकलती रहती है जिसका प्रवाह ऊपर की ओर है। यह ऊर्जा भी ब्रह्मांडीय ऊर्जा से मिलकर साढ़े तीन (3.5) बिन्दु अमृत का निर्माण करती है जिसमें अढ़ाई बिन्दु अमृत का उपयोग वैसे ही होता है, जैसे पुरुष में। मगर शेष एक बिन्दु एक ऐसे विलक्षण 'गंधतत्व' का निर्माण करती है जो स्त्री की किशोरावस्था में प्रवेश करते ही उसकी देह से प्रस्फुटित होने लगती है। उस अनिर्वचनीय गंधतत्व को तांत्रिकों की भाषा में 'पुष्पली' गन्ध कहते हैं। इसी पुष्पली गन्ध के प्रभाव से पुरुष स्त्रियों की ओर आकर्षित होते हैं या स्त्रियां पुरुषों को अपनी ओर अज्ञात रूप से आकर्षित करती रहती हैं जिसका गूढ़ रहस्य जन साधारण को ज्ञात नहीं होता है।

शेष आगे की पोस्ट में--

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स्वयंकीओर

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*एकांत, मौन और ध्यान—समाधि के उपाय हैं। ये तीन चरण हैं।*

_अपने को अकेला जानो। अकेले आए हो, अकेले जाओगे, अकेले हो। संग—साथ सब झूठ है। संग—साथ सब खेल है। संग—साथ सब मान्यता है, मानी हुई बात है। कोन किसका है? न पत्नी, न पति; न भाई, न बहन, न मित्र। कोन किसका है? अकेले आए, अकेले जाओगे, अकेले हो।_
_इस भाव को गहन कर लेने का नाम एकांत है।_

_मैं अकेला हूं; मैं अकेला हूं —ऐसा श्वास—श्वास मैं रम जाए। मैं अकेला हूं —ऐसा हृदय की धड़कनों में बस_ _जाए। मैं अकेला हूं—यह बात इतनी प्रगाढ़ होकर बैठ जाए कि कभी भूले न, क्षणभर को न भूले। यही संसार से मुक्ति है।_

_यह नहीं कि तुम पत्नी को छोड़कर जाओ। यह जानना कि मैं अकेला हूं। पत्नी है, तो रहे। बेटे हैं, तो रहें। घर है, तो रहे। लेकिन मैं अकेला हूं। भरे घर में तुम अकेले हो जाओ। भरी भीड़ में तुम अकेले हो जाओ। यह सारा संसार चल रहा है और मैं अकेला हूं —यह एकांत की भाव— भंगिमा है।_

_और जब अकेला हूं तो बोलना क्या है! किससे बोलना है? क्या बोलना है? तो एक चुप्पी अपने आप उतरने लगे।_
_और जब चुप ही होने लगे, तो भीतर भी क्या सोचना? आदमी को बोलना होता है, तो सोचता है। बोलना तभी होता है, जब सोचता है कि दूसरे हैं। ये सब जुड़ी हैं बातें। इन सबकी श्रृंखला है।_

_आदमी सोचता है, क्योंकि बोलना है। बोलता है, क्योंकि दूसरों से जुड़ना है। जब दूसरों से जुड़े ही नहीं हैं हम, और जुड़ सकते ही नहीं हैं हम, तो बोलना क्या? फिर सोचना क्या!_

_और ये तीन बातें पूरी हो जाए——एकांत, मौन .और ध्यान—तों फिर जो शेष रह जाती है दशा, समाधि। तब सम हो गए। शून्य प्रगट हुआ!! 

🌹 *ओशो*🌹

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