-पुरुष की अपेक्षा स्त्री क्यों अधिक सुन्दर, सुडौल और आकर्षक होती है ?

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                        भाग--01
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

       इस समस्त विश्वब्रह्माण्ड में एक मूल परमतत्व है जिसे लोगों ने 'परब्रह्म' के नाम से पुकारा है, 'परमेश्वर' के नाम से संबोधित किया है।
       भारतीय तत्ववेत्ताओं के अनुसार सृष्टि के प्राक्काल में वह मूल परमतत्व घनीभूत होकर दो भागों में विभक्त हो गया। जब भारतीय संस्कृति का विकास हुआ तो लोगों ने उन दोनों भागों को 'शिव' और 'शक्ति' की संज्ञा दी। आगे चलकर सृष्टि के विकास-क्रम में शिव और शक्ति 'पुरुषतत्व' और 'स्त्रीतत्व' की संज्ञा में परिवर्तित हो गए। बाद में वही दोनों तत्व 'ब्रह्म-माया',  'पुरुष-प्रकृति' और 'परमेश्वर-परमेश्वरी' में परिकल्पित हुए।
        इन्हीं दोनों तत्वों से ब्रह्माण्ड में दो प्रकार की विद्युत् चुम्बकीय तरंगें उत्पन्न हुईं जिन्हें आज के वैज्ञानिक 'इलेक्ट्रॉन' और 'प्रोटोन' कहते हैं। इन दोनों तरंगों के बीच एक और तरंग है जिसे 'न्यूट्रॉन' की संज्ञा दी गयी है। न्यूट्रॉन विद्युत् विहीन होते हुए भी चुम्बकीय ऊर्जा से युक्त तरंग है। इन्हीं तीनों तरंगों से परमाणु की रचना होती है। 
      पुरुष तत्व धनात्मक है और स्त्री तत्व  है--ऋणात्मक। यही कारण है कि दोनों तत्व बराबर एक दूुसरे की और उसी प्रकार आकर्षित होते रहते हैं जिस प्रकार परमाणु की परिधि पर इलेक्ट्रॉन बराबर चक्कर लगाया करते हैं। जहाँ आकर्षण है, वहां 'काम' है और काम मिथुनात्मक है अर्थात् आनंद के लिए। दोनों तत्वों के बीच जो आकर्षण है और उस आकर्षण से उत्पन्न जो 'काम' है, वह सृष्टि की दिशा में 'आदि आकर्षण' और 'आदि काम' है। कामजन्य आकर्षण मिथुनात्मक है। इसीलिये कहा गया है कि सृष्टि के मूल में 'मैथुन' है। दो विपरीत तत्वों के आपसी आकर्षण से जब 'काम' का जन्म होता है तो उसकी परणति मैथुन में होती है। मैथुन का परिणाम है--'सृष्टि' जो एक नैसर्गिक क्रिया है और इसी को 'विश्ववासना' कहते हैं तथा स्त्री इसी 'विश्ववासना' की प्रतिमूर्ति है।
       सृष्टि के प्राक्काल में जब शिव (पुरुष) तत्व और शक्ति( स्त्री ) तत्व एक दूसरे की ओर आकर्षित होकर एक दूसरे की सत्ता में विलीन हुए तो उसके परिणाम स्वरुप  विश्व ब्रह्माण्ड में एक विराट और सर्वव्यापी चेतना का आविर्भाव हुआ जिसे आगे चलकर 'परमशक्ति' अथवा 'आदिशक्ति' के नाम से पुकारा गया। यह बिलकुल स्पष्ट है कि इस 'आदिशक्ति' का आदिविकास मिथुनात्मक है।
        शिवतत्त्व और शक्तितत्त्व के आकर्षणात्मक, सामंजस्यात्मक और मिथुनात्मक भाव 'लिंग' और उसकी 'पीठिका' (अर्घा) है। वैदिक काल में इन दोनों को दो अरणियों के रूप में चित्रित किया गया था। ऊपर की अरणी अर्थात् शिवलिंग पुरुषतत्व वाचक और नीचे की अरणी को स्त्रीतत्व वाचक कहा जाता है। शिव की अर्धनारीश्वर छवि भी इसी तथ्य की ओर संकेत करती है।
        रौद्रात्मक, विसर्गात्मक और प्रदानात्मक प्रवृत्ति 'पुरुष' है और सहनात्मक, शान्त्यात्मक और आदानात्मक प्रवृत्ति 'स्त्री' है। प्रदान करने वाला पुरुष और ग्रहण करने वाली स्त्री है। यही नियम सर्वत्र व्याप्त है।
      शैव और शाक्त दर्शन के अनुसार शिव प्रकाश है और शक्ति है स्फूर्ति। सृष्टि के आरम्भ में जब शिव ने आकर्षित होकर शक्ति में प्रवेश किया तो उससे 'बिन्दु' की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार जब शक्ति ने आकर्षित होकर शिव में प्रवेश किया तो दोनों की संयुक्त सत्ता से 'नाद' का जन्म हुआ। 'बिन्दु' और 'नाद' की संयुक्ति से 'काम' का आविर्भाव हुआ। 'काम' में पुरुष और स्त्री दोनों तत्वों का तादात्म्य है।
     'बिन्दु' को 'श्वेत् बिन्दु' और ' नाद' को 'रक्त बिन्दु' कहा जाता है। श्वेतबिन्दु और रक्तबिन्दु के संयोग से 'कला' का निर्माण होता है। पुनः इन दोनों बिन्दुओं और पहले वाले मिश्र बिन्दु के साहचर्य से एक विलक्षणव तत्व का आविर्भाव होता है जिसे 'काम-कला' की संज्ञा दी गयी है। काम पुरुषवाचक है और कला स्त्रीवाचक है। कहने की आवश्यकता नहीं, इसी परमतत्व का दूसरा नाम आदिशक्ति, परमाशक्ति, चेतनाशक्ति है जो अखिल विश्वब्रह्माण्ड में व्याप्त है और जो 'कुण्डलिनी' के रूप में हम सभी मनुष्यों के शरीर में भी विद्यमान है।
        हम-आप सभी जानते हैं--वर्ण मातृकाओं का प्रथम अक्षर 'अ' है और अन्तिम अक्षर है 'ह'। आदि अक्षर 'अ' को शिवतत्त्व और अन्तिम अक्षर 'ह' को शक्तितत्त्व का प्रतीक माना गया है। ये दोनों अक्षर शिव और शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। सभी वर्णाक्षरों का लय 'म्' अक्षर में होता है। 'अ' और 'ह' में यदि 'म्' जोड़ दें तो 'अहम्' शब्द बनता है और यही 'अहम्' शब्द 'काम-कला' का दूसरा नाम है। काम-शक्ति 'कुण्डलिनी' अहम् के रूप में आदिशक्ति है और यही है 'आत्मशक्ति' भी।
        हर व्यक्ति अपने को 'मैं' कहता है। वह 'मैं' को अपना आलम्बन समझता है। संसार के सभी पदार्थ बदलते रहते हैं मगर 'मैं' का जो बोध है, वह कभी नहीं बदलता। मैं हूँ या नहीं हूँ--यह संदेह किसी के मन में कभी नहीं उठता।
        सृष्टि की प्रक्रिया में 'शिव' जड़तत्व है और 'शक्ति' है चेतनतत्व। जड़ चेतना का आधार है। मगर जड़ पदार्थ दिखलाई पड़ता है और उसके माध्यम से प्रकट होने वाली चेतना शक्ति दिखलाई नहीं पड़ती। उसे तो हम सिर्फ महसूस कर सकते हैं। कोई भी शक्ति बिना किसी माध्यम के कभी प्रकट नहीं हो सकती और जिस माध्यम से वह शक्ति प्रकट होती है, उसे गतिमान , चलायमान कर देती है--शक्ति का यह सबसे बड़ा गुण है। जड़ आधार है तो चेतना आधेय है। जड़ 'आसन' है और चेतना है--'आसीन'। शंकर पर आरूढ़ काली की छवि का आगे की ओर बढ़ा हुआ पैर इसी रहस्य को प्रकट करता है। शिव के ऊपर आरूढ़ काली शक्ति की गतिमान अवस्था का द्योतक है।
      हमारा शरीर भी तो जड़ है। जब तक उसे आधार बनाकर चेतना उपस्थित रहती है, तब तक शरीर चैतन्य रहता है, क्रियाशील रहता है जिसे हम जीवन कहते हैं। लेकिन चेतना से शरीर का सम्बन्ध टूटते ही जीवन की कड़ी भी हमेशा के लिए टूट जाती है फिर शरीर 'शिव' से 'शव' हो जाता है।
       सृष्टि के निर्माण के विकास- क्रम में कुण्डलिनी का ही योगदान है। प्राणियों के विकास में शिवतत्त्व 'शुक्रबिन्दु' (Y)के रूप में मनुष्य के शरीर में स्थित 'सहस्रार चक्र' में अवस्थित है। इसी प्रकार शक्तितत्त्व 'रजोबिन्दु' (X)के रूप में स्त्री देह के भीतर 'मूलाधार चक्र' में विद्यमान है। मगर पुरुष शरीर की यह विशेषता है कि उसके मूलाधार चक्र में 'कुण्डलिनी शक्ति' के रूप में 'शिव' और 'शक्ति' दोनों तत्व (X औरY) समान मिश्रित रूप में अर्धनारीश्वर के रूप में और मिथुनात्मक स्थिति में अवस्थित है। यही महामाया है, आदिशक्ति है और यही है-- परमा शक्ति।
        चक्रों में अंतिम चक्र 'सहस्रार' है। इसी चक्र के मूल केंद्र में 'शिववतत्वरूप शुक्रबिन्दु' की स्थिति है। इस शुक्र बिन्दु से बराबर एक विशेष् प्रकार की विद्युत् चुम्बकीय ऊर्जा निकलती रहती है जो ब्रह्मांडीय ऊर्जा में मिलकर अढ़ाई(2.5) बिन्दु अमृत की रचना ब्राह्म मुहूर्त में करती है। यही अमृत जीवनीशक्ति है। पहली बून्द मुंह में गिरती है जिससे मुंह में लार बनती है। मृत्यु के 24 घंटे पहले जब मनुष्य के जीवन की सारी सांसे समाप्त होने वाली होती हैं और उसका समय पूरा होने वाला होता है तो यही अमृत बूंद गिरनी बन्द हो जाती है और फिर धीरे-धीरे मनुष्य मृत्यु की अन्तिम स्थिति की ओर बढ़ने लगता है। उसकी वाणी मूक होने लगती है या लड़खड़ाने लगती है, गला अवरुद्ध होने लगता है, शरीर शीतल होने लगता है और नाड़ी तथा ह्रदय की गति अवरुद्ध होने लगती है। इन लक्षणों के आधार पर मनुष्य को स्वयम् अपनी निकटवर्ती मृत्यु का बोध होना शुरू हो जाता है। अन्त में वह मूर्छा में चला जाता है जो कुछ ही समय में मृत्यु की मूर्छा के रूप में बदल जाती है। 
        दूसरी बून्द जो हृदय में पहुँचती है, जो उसे शक्ति प्रदान करती है और जिसके ही कारण हृदय चौबीसों घंटे बराबर काम करता रहता है, वह भी गिरना बन्द हो जाती है और हृदय को शक्ति मिलना बन्द हो जाती है। शेष आधी बून्द नाभि में पहुँचती है, जिससे हमें भूख लगती है और अन्न का रस बनता है। उस आधी बून्द के बन्द होते ही भूख-प्यास ख़त्म हो जाती है और पेट की पाचन क्रिया भी बन्द हो जाती है।
        इसी प्रकार स्त्री के मूलाधार चक्र में शक्तितत्वस्वरूप 'ऋणात्मक राजोबिन्दु' की स्थति है। इससे भी विद्युत् चुम्बकीय ऊर्जा निकलती रहती है जिसका प्रवाह ऊपर की ओर है। यह ऊर्जा भी ब्रह्मांडीय ऊर्जा से मिलकर साढ़े तीन (3.5) बिन्दु अमृत का निर्माण करती है जिसमें अढ़ाई बिन्दु अमृत का उपयोग वैसे ही होता है, जैसे पुरुष में। मगर शेष एक बिन्दु एक ऐसे विलक्षण 'गंधतत्व' का निर्माण करती है जो स्त्री की किशोरावस्था में प्रवेश करते ही उसकी देह से प्रस्फुटित होने लगती है। उस अनिर्वचनीय गंधतत्व को तांत्रिकों की भाषा में 'पुष्पली' गन्ध कहते हैं। इसी पुष्पली गन्ध के प्रभाव से पुरुष स्त्रियों की ओर आकर्षित होते हैं या स्त्रियां पुरुषों को अपनी ओर अज्ञात रूप से आकर्षित करती रहती हैं जिसका गूढ़ रहस्य जन साधारण को ज्ञात नहीं होता है।

शेष आगे की पोस्ट में--

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अपनी आध्यात्मिक अवस्था को कैसे जाने

  प्रत्येक साधक की कुछ दिन ध्यान साधना करने के बाद यह जानने की इच्छा होती हैं  की मेरी कुछ आध्यात्मिक प्रगति हुई या नहीं और आध्यात्मिक प्रगति को नापने का मापदंड है  आपका अपना चित्त,आपका अपना चित्त कितना शुद्ध और पवित्र हुआ है  वही आपकी आध्यात्मिक स्थिति को दर्शाता हैं ।अब आपको भी अपनी आध्यात्मिक प्रगति जानने की इच्छा हैं तो आप भी इन निम्नलिखित चित्त के स्तर से अपनी स्वयम की आध्यात्मिक स्थिति को जान सकते हैं ,बस अपने चित्त का प्रामाणिकता के साथ ही अवलोकन करें यह अत्यंत आवश्यक हैं । 1 ) दूषित चित्त --: चित्त का सबसे निचला स्तर हैं  दूषित चित्त  इस स्तर पर साधक सभी के दोष ही खोजते रहता हैं  दूसरा  सदैव सबका बुरा कैसे किया जाए सदैव इसी का विचार करते रहता है  दूसरों की प्रगति से सदैव ईर्ष्या करते रहता हैं  नित्य नए-नए उपाय खोजते रहता हैं की किस उपाय से हम दुसरे को नुकसान पहुँचा सकते हैं  सदैव नकारात्मक बातों से  नकारात्मक घटनाओं से  नकारात्मक व्यक्तिओं से यह  चित्त सदैव भरा ही रहता हैं  2 ) भूतकाल में खोया चित्त --: एक चित्त एसा होता हैं   वः सदैव भूतकाल में ही खोया हुआ होता हैं | वह सदैव भ