वास्तविक स्वरूप

वास्तविक स्वरूप

मनुष्य का वास्तविक स्वरूप उसकी आत्मा है। किन्तु मन को ही अपना स्वरूप मान लेता है। अपने को चैतन्य स्वरूप मानने पर साधक चिदानंद स्वरूप में लीन हो जाता है।

जिस प्रकार आकाश भी शून्य स्वभाव है। तो भी उसकी सत्ता को स्वीकार किया गया है। इसी प्रकार वह परमात्मा भी शून्य स्वभाव वाला होते हुवे भी उसकी सत्ता है। उसे कई प्रयोगों व प्रमाणों से सिद्ध किया जा सकता है। वह किसी भी प्रकार की आकृति से रहित होते हुवे भी मिथ्या नही है।

वही ईस्वर विस्वाब्यापी चैतन्य है जो अपने भीतर आत्मा रूप में अवस्थित है। शरीर मे जो पीड़ा होती है। वह उस आत्मा चैतन्य के कारण ही होती है। उसकी उपस्थिति में पीड़ा नही हो सकती अतः पीड़ा का अनुभव करने वाली चेतना ही है।

साधक जब अन्तर्मुखी हो जाता है। तो उसे आत्मस्वरूप का ज्ञान हो जाता है। ये सारी इच्छाएं वासनाये आदि केवल मन की उपज है। मन के शांत होने पर योगी आत्मस्वरूप हो जाता है।

यह आत्मा ही ब्रह्म है। अयमात्मा ब्रह्म ऐसी भावना दृढ़ हो जाने पर योगी को परमार्थ तत्व का ज्ञान हो जाता है।

ओउम

पंडित महाबीर प्रसाद

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