आध्यात्म ज्ञान

अध्यात्म ज्ञान धारण करने का तत्व है हम जितना अध्यात्म को धारण करते जाएंगे उतना ज्यादा ईश्वर का और सत्य का अनुभव करते जाएंगे बिना धारण किए हुए यह ज्ञान हमारे किसी काम का नहीं है ?
जैसे ठंड का महीना चल रहा है हमें ठंडी भी खूब लग रही है और हम कंबल का खूब बखान करें कंबल इतना होता है मोटा होता है बहुत गर्म करता है कंबल उड़ने वाले को ठंड नहीं लगता है कंबल में हाथ पैर साहब सीमेट लेते हैं कंबल का कितना भी बखान कर ले जब तक हम उस कंबल को अपने शरीर पर धारण नहीं करेंगे तब तक उस कंबल का कितना भी बखान कर ले वह हमारे किसी काम का होता नहीं है ठीक उसी प्रकार से ज्ञान जब तक धारण न किया जाए हमारे किसी काम का नहीं है,
कंबल को शरीर पर धारण किया जाता है , और ज्ञान को हमारे अंतःकरण पर ज्ञान रूपी प्रकाश धीरे-धीरे अंतः करण को नया प्रकाश देकर अंधकार रूपी अज्ञान को नष्ट कर देता है जिससे जीवन की सत्यता और सार्थकता का अनुभव होता है ?
इसलिए महापुरुषों ने कहा है बाहर से कितना भी ज्ञान ले लो वह ज्ञान जब तक हमारे अंतःकरण में प्रकट नहीं होगा तब तक बाहरी ज्ञान से काम चलेगा नहीं मनुष्य जीवन के कल्याण के लिए ज्ञान को अंतःकरण में धारण करना ही पड़ेगा

शुद्ध आध्यात्म ज्ञान

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अपनी आध्यात्मिक अवस्था को कैसे जाने

  प्रत्येक साधक की कुछ दिन ध्यान साधना करने के बाद यह जानने की इच्छा होती हैं  की मेरी कुछ आध्यात्मिक प्रगति हुई या नहीं और आध्यात्मिक प्रगति को नापने का मापदंड है  आपका अपना चित्त,आपका अपना चित्त कितना शुद्ध और पवित्र हुआ है  वही आपकी आध्यात्मिक स्थिति को दर्शाता हैं ।अब आपको भी अपनी आध्यात्मिक प्रगति जानने की इच्छा हैं तो आप भी इन निम्नलिखित चित्त के स्तर से अपनी स्वयम की आध्यात्मिक स्थिति को जान सकते हैं ,बस अपने चित्त का प्रामाणिकता के साथ ही अवलोकन करें यह अत्यंत आवश्यक हैं । 1 ) दूषित चित्त --: चित्त का सबसे निचला स्तर हैं  दूषित चित्त  इस स्तर पर साधक सभी के दोष ही खोजते रहता हैं  दूसरा  सदैव सबका बुरा कैसे किया जाए सदैव इसी का विचार करते रहता है  दूसरों की प्रगति से सदैव ईर्ष्या करते रहता हैं  नित्य नए-नए उपाय खोजते रहता हैं की किस उपाय से हम दुसरे को नुकसान पहुँचा सकते हैं  सदैव नकारात्मक बातों से  नकारात्मक घटनाओं से  नकारात्मक व्यक्तिओं से यह  चित्त सदैव भरा ही रहता हैं  2 ) भूतकाल में खोया चित्त --: एक चित्त एसा होता हैं   वः सदैव भूतकाल में ही खोया हुआ होता हैं | वह सदैव भ