यह आत्मा चैतन्य  है

यह आत्मा चैतन्य है

 
मुक्त है। असीम है।सभी में व्याप्त है। आत्मा को किसी भी बंधन में बांधा नहीं जा सकता शरीर तो सीमित है।

 मन बुद्धि सीमित है। यह सारी विविधता शारीरिक और मानसिक है।आत्मा में कोई विविधता नहीं तुम शरीर नहीं हूं व्यापक आत्मा हो इस कारण तुम सदैव से ही मुक्त हो यह मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है।

 इसको प्राप्त नहीं करना या तो स्वयं ही उपलब्ध है।केवल इसकी पहचान करने की आवश्यकता है। कि एवं उपभोक्ता होकर कोई ठीक से मात्र सुन ले तो घटना घट जाएगी उसी पल जन्मों-जन्मों की विस्मृति टूट जाएगी स्मरण लौट आएगा खोज करने वाला भटक जाता है।

 खोज करने से परमात्मा नहीं मिलता खोजों को छोड़ कर संसार के प्रति उदासीनता त्याग वान होकर विश्राम में स्थित हो जाना ही पा लेने का मार्ग है।

 आत्मा व्यापक है।सब में एक ही है।किंतु शरीर की विविधता के कारण अज्ञानी व्यक्ति को आत्मा की दिव्या दत्ता का संदेह हो जाता है यह मेरी आत्मा है।उसकी आत्मा अलग-अलग आत्मा आत्मा अनंत है। आदि यह अज्ञान  है।

ओ३म

पंडित महाबीर प्रसाद

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