यह आत्मा चैतन्य है

 
मुक्त है। असीम है।सभी में व्याप्त है। आत्मा को किसी भी बंधन में बांधा नहीं जा सकता शरीर तो सीमित है।

 मन बुद्धि सीमित है। यह सारी विविधता शारीरिक और मानसिक है।आत्मा में कोई विविधता नहीं तुम शरीर नहीं हूं व्यापक आत्मा हो इस कारण तुम सदैव से ही मुक्त हो यह मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है।

 इसको प्राप्त नहीं करना या तो स्वयं ही उपलब्ध है।केवल इसकी पहचान करने की आवश्यकता है। कि एवं उपभोक्ता होकर कोई ठीक से मात्र सुन ले तो घटना घट जाएगी उसी पल जन्मों-जन्मों की विस्मृति टूट जाएगी स्मरण लौट आएगा खोज करने वाला भटक जाता है।

 खोज करने से परमात्मा नहीं मिलता खोजों को छोड़ कर संसार के प्रति उदासीनता त्याग वान होकर विश्राम में स्थित हो जाना ही पा लेने का मार्ग है।

 आत्मा व्यापक है।सब में एक ही है।किंतु शरीर की विविधता के कारण अज्ञानी व्यक्ति को आत्मा की दिव्या दत्ता का संदेह हो जाता है यह मेरी आत्मा है।उसकी आत्मा अलग-अलग आत्मा आत्मा अनंत है। आदि यह अज्ञान  है।

ओ३म

पंडित महाबीर प्रसाद

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अपनी आध्यात्मिक अवस्था को कैसे जाने

  प्रत्येक साधक की कुछ दिन ध्यान साधना करने के बाद यह जानने की इच्छा होती हैं  की मेरी कुछ आध्यात्मिक प्रगति हुई या नहीं और आध्यात्मिक प्रगति को नापने का मापदंड है  आपका अपना चित्त,आपका अपना चित्त कितना शुद्ध और पवित्र हुआ है  वही आपकी आध्यात्मिक स्थिति को दर्शाता हैं ।अब आपको भी अपनी आध्यात्मिक प्रगति जानने की इच्छा हैं तो आप भी इन निम्नलिखित चित्त के स्तर से अपनी स्वयम की आध्यात्मिक स्थिति को जान सकते हैं ,बस अपने चित्त का प्रामाणिकता के साथ ही अवलोकन करें यह अत्यंत आवश्यक हैं । 1 ) दूषित चित्त --: चित्त का सबसे निचला स्तर हैं  दूषित चित्त  इस स्तर पर साधक सभी के दोष ही खोजते रहता हैं  दूसरा  सदैव सबका बुरा कैसे किया जाए सदैव इसी का विचार करते रहता है  दूसरों की प्रगति से सदैव ईर्ष्या करते रहता हैं  नित्य नए-नए उपाय खोजते रहता हैं की किस उपाय से हम दुसरे को नुकसान पहुँचा सकते हैं  सदैव नकारात्मक बातों से  नकारात्मक घटनाओं से  नकारात्मक व्यक्तिओं से यह  चित्त सदैव भरा ही रहता हैं  2 ) भूतकाल में खोया चित्त --: एक चित्त एसा होता हैं   वः सदैव भूतकाल में ही खोया हुआ होता हैं | वह सदैव भ